बारिश का वह दिन – सुरेखा  साहू

बारिश का वह दिन – सुरेखा साहू

बात इस रविवार की है, जब एक लंबे इंतजार के बाद दिल्ली में मूसलाधार बारिश हुयी, वह भी कुछ 10-15 मिनट के लिए नहीं पूरे 2 घंटे के लिए | बेटे की परीक्षा थी, उसे लेने घिटोरनी जाना था| साथ में उसका एक दोस्त भी था जो हमारे ही मोहल्ले में रहता है| सुबह उसकी माताजी ने दोनों बच्चों को छोड़ा था, अब हमारी बारी थी | बातों ही बातों में उनसे पता चला था कि, घिटोरनी में कई फैक्ट्री आउटलेट्स है, जहां पर सामान बहुत ही सस्ते दामों में मिल जाता है |  फिर क्या था, झट – पट प्लान बनाया कि जब घिटोरनी जा ही रहे हैं तो क्यों ना पूरे घर के चप्पल – जूते बदल दिए जायें | पतिदेव को भी शॉपिंग के लिए मना लिया | रविवार दोपहर की नींद का त्यागकर, समय से काफी पहले तैयार होकर हम दोनों अपनी रिट्ज कार में घर सेरवाना हुए | मौसम बहुत ही सुहावना था| कार में पुराने फिल्मी गीत बज रहे थे| सुहावने मौसम और रास्ते की हरियाली का मजा लेते हुए हम दोनों घिटोरनी की तरफ बढ़ रहे थे| जैसे ही आधी दूर पहुंचे, तेज बारिश शुरू हो गई |रास्ते में कई जगह पानी भर गया | शॉपिंग के उत्साह में,पानी से भरी रोड के ऊपर कार ले जाने की पतिदेव की तकलीफ को भी नजरअंदाज किया |शॉपिंग का कीड़ा हमारे अंदर घर कर जो बैठा था |  घर से चलने से पहले ही सभी के जूते – चप्पलों के साइज भी हमने ले लिये थे | किसी तरह तेज बारिश में घिटोरनी रोड तक पहुंचे, चारों तरफ पानी भरा हुआ था | जैसे ही दाहिने तरफ देखा कई फैक्ट्री आउटलेट दिखे | हमारी नजर एडीडास फैक्ट्री आउटलेट पर पड़ी और दिल खुशी से झूम उठा बस यहीं जाना है | समय भी 1 घंटे का बचा था | यहीं से पूरे घर के चप्पल जूते लेंगे मन ही मन सोच रहे थे,लेकिन जैसे ही नजर पतिदेव की तरफ गयी हमारी ख़ुशी काफूर हो गयीलगा कुछ तो गड़बड़ है |अपने चारों तरफ देखा तो पानी ही पानी था |दुकान के सामने तो पानी और भी ज्यादा भरा था | पतिदेव ने तुरंत हाथ खड़े कर दिए और कहा शॉपिंग करनी है तो पैदल जाओ कार तो वहाँ  तक नहीं जा पायेगी,क्योकि हर पति की तरह इन्हें भी पत्नी से ज्यादा अपनी कार प्यारी थी|  

तभी हमने मन ही मन हिसाब लगाना शुरू किया, कार और शॉप की दूरी यही कोई 15-20 मीटर थी|किसी भी रस्ते से जाते तो घुटने तक पानी में से चलकर जाना ही पड़ता और भीगे हुए ही हमें घर जाना पड़ता | काफी सोच विचार कर बुझे हुए मनसे शॉपिंग का इरादा त्याग दिया| सोचा कार में ही बैठा जाए क्यों अपने कपड़ोंको  गन्दा और खुद को इतना परेशानी में डाला जाए |

हमारा इशारा मिलते ही पतिदेव ने तुरंत अपनी कार मोड़ ली और उस जगह के खोज में निकल लिए जहां कम पानी हो औरकुछ देर इंतजार किया जा सके| थोड़ा आगे जाने पर रोड में पानी का लेवल कुछ कम दिखा तुरंत गाड़ी कोने में लगा दी और आराम से पुराने फिल्मी गीतों का मजा लेने लगे और पानी में डूबते सम्हलते लोगो को देखने लगे |

जब परीक्षा का समय खतम होने आया सोचा अब चला जाये |गाड़ी स्टार्ट की, पर गाड़ी स्टार्ट होने का नाम नहीं ले रही थी | बहुत कोशिश की,पर कार टस से मस नहीं हुई | जब लगा अब कुछ नहीं हो सकता और समय भी बीता जा रहा था, पतिदेव निकल गए कार को धक्का देने वालों की खोज में |

मै भी कार से उतर कर साइड में छाता निकाल कर खड़ी हो गई | तभी मैंने एक बाइक पर 3 लड़कों को अपनी आते हुए देखा | वह पूरे भीगे हुए थे स्लीपर पहनी हुई थी |कार के पीछे जैसे ही पहुंचे   मुस्कुराते हुए मैंने उनसे रिक्वेस्ट की क्या इसे स्टार्ट करने में मदद करेंगे | आगे बैठा हुआ लड़का मुस्कराते हुए बोला आंटी क्या यह कार आपकी है ?  “आंटी”  शब्द सुनकर पूरे तन मन में आग लग गई थी पर क्या करे मजबूरी भी थी कार हिल ही नहीं रही थी औरऊपर से पतिदेव भी खाली हाथ लौटते दिखे|

आते ही पतिदेव बोले सामने वालो ने कहा कि उनका ट्रक भी खराब है, वह खुद परेशानी में हैं तो कैसे हमारी मदद करें | मैंने कहा चलो कोई बात नहीं कोई हमें मदद के लिए मिल ही गया |अबपतिदेव कार के अंदर बैठ गए और बच्चों ने धक्का लगाना शुरू किया | कार स्टार्ट नहीं हुई | किसी ने कहा ‘अंकल कार को सीधी तो करिए’,  कार को सीधे करके फिर धक्का लगाया कार फिर भी स्टार्ट नहीं हुई | फिर एक लड़का बोलाकार का बोनेट खोलियेहो सकता है पानी भर गया हो |बोनेटखोलने पर अंदर पानी का नामो निशान नहीं था |   एक लड़के ने कहा,  जो ज्यादातर आदेश दे रहा था,  पानी तो नहीं है कुछ और प्रॉब्लम है इसे  रिवर्स में स्टार्ट करते हैं रिवर्स में धक्का देकर देखा जाए |आदेश पा  कर पतिदेव कार में बैठ गए औरबच्चों ने दूसरी तरफ से धक्का देना शुरू किया | थोड़ी देर में कार स्टार्ट होगयी| तभी मेरे बेटे का फोन आया ‘मम्मी परीक्षा खत्म हो गई है अब आ जाओ लेने’ | मैंने मुस्कुराकर उन बच्चों को थैंक्यू कहा और अपने मोबाइल के पाउच में रखे हुए 100 रूपये  उनकी तरफ़ बढ़ाए,तभी वह लड़का हंसते हुये अपने दोस्तों से बोला,‘अरे देखो आंटी पैसे दे रही है’, ‘आंटी वी आर नॉट मैकेनिक, हम तो स्टूडेंट हैं‘,इस बार आंटी शब्द सुनकर पहले की तरह गुस्सा नहीं आया बल्कि दिल से कई  दुआएंनिकलीं| मैंने पूछा बेटा क्या करते हो ? बोला ‘आंटी में इंजीनियरिंग कर रहा हूं, ट्रिपल आईटी जबलपुर से’ | मन खुश हो गया| मैंने उस लड़के का नाम पूछा तो उसने बताया “आशीष” और मुस्कुराते हुए अपने दोस्तोंके साथ बाइक पर सवार हो कर चला गया | थोड़ी देर तक मैं वहीं खड़ी  होकर उसे जाते देखती  रही – यह सोचते हुए किधन्य हैं वह माँ बाप जिन्होंने अपनों बच्चों को इतनी अच्छी शिक्षा दी है | उन्होनें अपने बच्चे को हर तरह से सक्षम बनाया कि वह जिंदगी का मजा लेते हुए हर मुश्किल का सामना कर सके और जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद भी कर सके | आज भी उस अनजान  लड़के आशीष का मुस्कुराता चेहरा मेरे सामने यदाकदा सजीव हो उठता है और दिल से उसके और उसके दोस्तों लिए ढेरों आशीष निकलते हैं |

This Post Has 6 Comments

  1. brajesh dubey

    सुंदर

    1. Surekha

      बहुत धन्यवाद

  2. पुष्पा

    बहुत सहज और सुंदर लेखनी सुरेखा ! मंजर की सजीव कर दिया !

  3. Anjali Srivastava

    बहुत मजेदार और प्रेरक कहानी!
    सुरेखा तुम्हारी यह हँसा-हँसा कर गंभीर बात बताना तुमको सबसे अलग करता है।
    खूब आगे बढ़ो और अनगिनत सुन्दर रचनाएं गढ़ो।
    तुम्हारी अपनी ही-
    अंजली श्रीवास्तव

    1. Surekha

      धन्यवाद पुष्पा

    2. Surekha

      बहुत बहुत आभार आपका, ऐसे ही आशीर्वाद बनाये रखें

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